Kala Paridrishya 2026


आमंत्रित फोटोग्राफी प्रदर्शनी, राज्य ललित कला अकादेमी, उत्तर प्रदेश
25 से 27 मार्च 2026 

अनिल रिसाल की छायाकारी : प्रकाश, छाया और मौन का संगीत

अवधेश मिश्र


छायाकारी (फोटोग्राफी) मूलतः प्रकाश और समय विशेष को रोक लेने की कला है, जिसमें दृश्य जगत की वास्तविकता को कैमरे के माध्यम से इस प्रकार संरक्षित किया जाता है कि वह समय के एक विशेष बिंदु का साक्ष्य बन जाए। प्रारंभिक छायाकारी का उद्देश्य प्रायः यथार्थ का दस्तावेज़ीकरण रहा—वस्तुओं, व्यक्तियों और स्थानों को उनके वास्तविक रूप में दर्ज करना। यह एक प्रकार से दृश्य-स्मृति का निर्माण था, जहाँ तकनीकी दक्षता और स्पष्टता प्रमुख तत्व माने जाते थे किन्तु समय के साथ छायाकारी ने केवल यथार्थ के अंकन की सीमा को पार कर एक स्वतंत्र कलात्मक अभिव्यक्ति का रूप धारण कर लिया। यही परिवर्तन आधुनिक छायाकारी के रूप में सामने आता है, जहाँ कैमरा केवल रिकॉर्ड करने का उपकरण नहीं बल्कि विचार, संवेदना और दृष्टिकोण का माध्यम बन जाता है। आधुनिक छायाकारी में विषय से अधिक महत्त्व दृष्टि का होता है—कैसे देखा जा रहा है, क्या चुना जा रहा है और किस प्रकार प्रस्तुत किया जा रहा है।

अनिल रिसाल सिंह की फोटोग्राफी इसी आधुनिक छायाकारी की परंपरा को सशक्त रूप से अभिव्यक्त करती है। उनके कार्यों में दृश्य का प्रत्यक्ष रूप जितना महत्त्वपूर्ण है, उससे कहीं अधिक उसकी संरचना, संतुलन और अंतर्निहित अर्थ होता है। वे साधारण दृश्यों, जैसे- सड़क का घुमाव, रेलिंग की रेखाएँ या किसी निर्जन स्थल की बनावट को इस प्रकार फ्रेम करते हैं कि वे एक गहन सौंदर्यबोध और वैचारिक संकेतों में परिवर्तित हो जाते हैं। उनकी तस्वीरों में न्यूनतावाद, ज्यामिति और रंगों का संयमित प्रयोग स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। एक साधारण पीली रेखा, सड़क का वक्र और निर्जन परिदृश्य—ये सभी मिलकर केवल एक दृश्य नहीं बल्कि एक अनुभव रचते हैं। यहाँ छायाकारी केवल “देखने” की क्रिया नहीं रह जाती बल्कि “अनुभूति” की प्रक्रिया बन जाती है। कह सकते हैं, जहाँ पारंपरिक छायाकारी यथार्थ को पकड़ती है, वहीं आधुनिक छायाकारी उस यथार्थ के भीतर छिपे सौंदर्य, लय और विचार को उद्घाटित करती है। अनिल रिसल सिंह दोनों प्रवृत्तियों को संतुलित करते हुए एक संवेदनशील दृष्टि के साथ छायाकारी का अपना मुहाबरा गढ़ते हैं जो साधारण को भी असाधारण बना सकती है।

वरिष्ठ छायाकार अनिल रिसाल सिंह लखनऊ को कर्मभूमि बनाकर सतत रचनारत रहे और छायाकारी-जगत का एक ख्यात नाम बन गए। अभिव्यक्ति की एक विधा के रूप में छायाकारी को एक नया धरातल दिया जिसमें प्रयोग की अपरिमित संभावनाएं है। उनकी छायांकन दृष्टि केवल दृश्य को दर्ज करने तक सीमित नहीं रहती बल्कि वह उसे एक कलात्मक अनुभव में रूपांतरित कर देती है। विशेष रूप से लखनऊ रेजीडेंसी तथा अन्य ऐतिहासिक एवं आधुनिक इमारतों का उनका जीवंत चित्रण दर्शक को उस स्थल की आत्मा से जोड़ देता है। अनिल की फोटोग्राफी की सबसे बड़ी विशेषता है—छाया, प्रकाश और ज्यामितीय आकारों का अद्भुत संतुलन। यह संतुलन मात्र तकनीकी कौशल का परिणाम नहीं बल्कि एक गहरी कलात्मक दृष्टि और संवेदनशील अनुभूति का प्रतिफल है। वे प्रकाश को केवल रोशनी के रूप में नहीं देखते बल्कि उसे एक सक्रिय तत्व की तरह इस्तेमाल करते हैं, जो चित्र में अर्थ, गहराई और लय का निर्माण करता है। वे साधारण वास्तु तत्वों—जैसे मेहराबें, दीवारों की बनावट, फर्श के पैटर्न, खिड़कियों के फ्रेम और गलियारों की रेखाओं—को इस प्रकार संयोजित करते हैं कि वे अमूर्तन के बावजूद बहुल ध्वनियों को प्रस्तुत करने वाले रूपाकार धारण कर लेते हैं। उनकी दृष्टि में ज्यामिति केवल आकारों का विज्ञान नहीं बल्कि एक सौंदर्यात्मक भाषा है, जिसके माध्यम से वे दृश्य को एक नए अर्थ-संयोजन में प्रस्तुत करते हैं।

प्रकाश की दिशा, छाया की गहराई और संरचनाओं की रेखाओं के बीच उनका सटीक संतुलन तस्वीर को केवल दृश्य न रहकर एक गहन और अविस्मरणीय अनुभूति बना देता है। कहीं तीव्र प्रकाश किसी एक बिंदु को उभारता है, तो कहीं गहरी छाया उस दृश्य में रहस्य और गंभीरता का संचार करती है। यह विरोधाभास ही उनके चित्रों को जीवंतता प्रदान करता है। उनकी फोटोग्राफी में सममिति और परिप्रेक्ष्य का विशेष महत्त्व है। वे ऐसे कोण चुनते हैं जहाँ संरचनाएँ स्वयं एक लयबद्ध संरचना का निर्माण करती हैं—मानो कोई दृश्य संगीत हो, जिसमें हर रेखा, हर छाया और हर प्रकाश-खंड एक स्वर की तरह उपस्थित हो। यही कारण है कि उनकी तस्वीरें केवल देखने के लिए नहीं बल्कि अनुभव करने के लिए होती हैं; वे दर्शक को ठहरकर देखने, सोचने और उस दृश्य के भीतर प्रवेश करने के लिए प्रेरित करती हैं।

उनकी तस्वीरों में प्रायः भवनों के घुमावदार आकार, तीखे कोण और संरचनात्मक रेखाएँ इस प्रकार उभरकर सामने आती हैं कि वे एक नए दृष्टिकोण को जन्म देती हैं। वे साधारण दीवारों, मेहराबों और खिड़कियों को इस तरह फ्रेम करते हैं कि वे केवल वास्तु-तत्व न रहकर एक सशक्त दृश्य-भाषा का रूप ले लेते हैं। उनके कैमरे की दृष्टि उन बारीकियों को सामने लाती है, जो सामान्यतः अनदेखी रह जाती हैं—जैसे प्रकाश की एक तिरछी किरण, दीवार पर पड़ती छाया का फैलाव या ईंटों की बनावट में छिपी समय की कहानी। उनके चित्रों में प्रकाश और अंधकार का संवाद एक विशेष नाटकीयता उत्पन्न करता है। तीव्र प्रकाश जहाँ किसी एक हिस्से को उभारता है, वहीं गहरी छाया अन्य भागों को रहस्यपूर्ण बना देती है। यह विरोधाभास न केवल दृश्य को आकर्षक बनाता है बल्कि उसमें एक भावनात्मक गहराई भी जोड़ता है—मानो हर छवि अपने भीतर एक मौन कथा संजोए हुए हो। ये छायाकारी और अनिल की दृष्टि यह सिद्ध करते हैं कि वास्तुकला केवल निर्माण नहीं बल्कि समय के साथ चल रही एक जीवंत कला है, जिसे संवेदनशील दृष्टि से देखा और महसूस किया जा सकता है। उनके लिए भवन केवल ईंट-पत्थरों का ढाँचा नहीं बल्कि समय, स्मृति और मानवीय अनुभव का संगम हैं जो दर्शक को ठहरकर देखने, सूक्ष्मताओं को समझने और उस स्थान के साथ एक आत्मीय संबंध स्थापित करने के लिए प्रेरित करती है, साथ ही देखने की एक नयी दृष्टि भी देती है कि किसी भी संरचना का वास्तविक सौंदर्य उसकी बाहरी भव्यता में नहीं बल्कि उन सूक्ष्म प्रकाश-छाया की उपस्थिति और ज्यामितीय लयों में निहित होता है, जिन्हें केवल एक संवेदनशील और सजग दृष्टि ही पहचान सकती है। अनिल रिसाल सिंह की छायाकला का हासिल यही है कि वे स्थिर वस्तुओं में भी गतिशीलता और भावनात्मक गहराई खोज लेते हैं। उनके कैमरे की नजर उन सूक्ष्मताओं को पकड़ लेती है, जिन्हें सामान्य दृष्टि अक्सर अनदेखा कर देती है। यही कारण है कि उनकी फोटोग्राफी दर्शक के मन में एक स्थायी प्रभाव छोड़ती है और उसे बार-बार उस छवि की ओर लौटने के लिए प्रेरित करती है।



























आमंत्रित चित्रकला प्रदर्शनी, राज्य ललित कला अकादेमी, उत्तर प्रदेश
25 से 27 मार्च 2026

अनिल शर्मा के चित्र : घाटों की लय और रंगों की ठुमरी

अवधेश मिश्र

 

अनिल शर्मा की कला-यात्रा एक ऐसे रचनाकार की कथा हैजिसने अपने परिवेश को केवल देखा नहींबल्कि उसे भीतर तक आत्मसात किया है। बनारस से प्रशिक्षण प्राप्त कर उसी नगरी को अपनी कर्मभूमि बनाने वाले इस कलाकार की सृजनात्मक चेतना में शहर की सांस्कृतिक सुगंध गहराई तक बसी हुई है। यद्यपि जीविकोपार्जन के क्रम में उन्होंने कुछ समय बहरीन में व्यतीत किया और वहाँ की समकालीन कला-परंपराओं के बीच सक्रिय रहकर अपने अनुभव-क्षेत्र का विस्तार कियाफिर भी उनके भीतर का मूल स्वर बनारस ही बना रहा—एक ऐसा स्वरजो गंगा के प्रवाह की तरह निरंतरजीवंत और आत्मीय है। उनकी चित्रकला में बनारस अनेक रूपों में साकार होता है। कहीं घाटों से टकराती गंगा की लहरें लयात्मक स्पंदन रचती हैंतो कहीं काम की तलाश में जाता एक श्रमिक जीवन-संघर्ष का मार्मिक प्रतीक बन जाता है। कहीं जल पर तैरता जहाज हैतो कहीं रामनगर का किला अपनी ऐतिहासिक गरिमा के साथ उपस्थित होता है। इन विविध विषयों के माध्यम से अनिल शर्मा ने न केवल अपनी एक विशिष्ट पहचान निर्मित की हैबल्कि कला-जगत में एक सशक्त और संवेदनशील उपस्थिति भी दर्ज की है। वे केवल चित्रकार नहींबल्कि विविध कला-गतिविधियों में सक्रिय एक सजग रचनाकार हैं। उनकी कला का एक महत्त्वपूर्ण आयाम यह है कि वे दृश्य-चित्रण के साथ-साथ अमूर्त अभिव्यक्ति में भी समान दक्षता और आत्मविश्वास के साथ कार्य करते हैं। यह द्वैत उनके सृजन को एक विशिष्ट गहराई प्रदान करता है—जहाँ एक ओर यथार्थ की स्पष्टता हैवहीं दूसरी ओर अनुभूति की सूक्ष्मअनिर्वचनीय परतें भी हैं। उनके अमूर्त चित्र किसी निश्चित कथा या रूपबंध में बँधे नहीं होतेबल्कि वे एक आंतरिक यात्रा के साक्ष्य हैंजिसमें भावस्मृति और अनुभूति स्वतः आकार ग्रहण करते हैं। इन अमूर्त रचनाओं में रंगों का फैलाव केवल एक तकनीक नहींबल्कि संवेदना का विस्तार है। रंग जैसे कैनवस पर बहते हैं—कहीं तीव्रकहीं मृदुकहीं संयत तो कहीं पूर्णतः मुक्त। इनके बीच उभरते अनजाने आकार दर्शक को किसी निष्कर्ष तक नहीं बाँधतेबल्कि उसे अपने भीतर झाँकने के लिए प्रेरित करते हैं। छोटे-बड़े स्ट्रोक्स का परस्पर घुलना-मिलना एक ऐसी लय रचता हैजो दृश्य से अधिक अनुभूति का आभास कराती है। गहरे और हल्के रंगों के बीच स्थापित संवाद मानो जीवन के द्वंद्वों—अंधकार और प्रकाशस्थिरता और प्रवाहबाह्य और आंतरिक—का कलात्मक रूपांतरण हो। इस रंग-व्यवहार से कैनवस एक जीवंत स्पेस में परिवर्तित हो जाता हैजहाँ हर रंग और हर स्ट्रोक अपनी स्वतंत्र उपस्थिति दर्ज करता है। यह रचना-प्रक्रिया वस्तुतः उस अनुभव का परिणाम हैजिसमें एक दृश्य-चित्रकार द्वारा आत्मसात किए गए छाया-प्रकाशआकार और प्रकृति के मूडअमूर्तन के स्तर पर नए अर्थ ग्रहण करते हैं।

अनिल के अमूर्त चित्रों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे दर्शक को केवल देखने के लिए नहींबल्कि अनुभव करने के लिए आमंत्रित करते हैं। पूरे कैनवस में व्याप्त यह स्पंदन एक प्रकार का दृश्य-संगीत रचता है—एक ऐसा संगीतजिसे सुना नहींबल्कि महसूस किया जाता है। यह स्पंदन धीरे-धीरे दर्शक के भीतर उतरता है और उसे एक गहरे आत्मिक संवाद में ले जाता है। यदि इस अनुभूति को बनारस की संगीत परंपरा के संदर्भ में देखा जाएतो इसकी गहराई और भी स्पष्ट हो उठती है। बनारस घराने की धारा—ध्रुपद की गाम्भीर्यपूर्ण आलापनाठुमरी की भाव-लय और तबले की जटिल लयकारी—इन सभी में जो आंतरिक स्पंदन और भाव-प्रधानता हैवही तत्व अनिल शर्मा की अमूर्त कला में भी प्रतिध्वनित होता है। उनके कैनवस पर रंगों का विस्तार मानो किसी राग के क्रमिक विकास जैसा है—जहाँ एक सूक्ष्म संकेत, आरोह-अवरोह और पकड़ से आरंभ होकर तान-आलाप की अनुगूँज के साथ अनुभूति धीरे-धीरे अपने पूर्ण आयाम ग्रहण करती है। स्ट्रोक्स का परस्पर मिलना-जुलना किसी तान या लयकारी की तरह प्रतीत होता हैजिसमें गति और विराम दोनों का समान महत्त्व है। गहरे और हल्के रंगों का संतुलन संगीत के मंद्र और तार सप्तक के सामंजस्य की याद दिलाता है। विशेषतः ठुमरी की तरहजहाँ शब्दों से अधिक भाव की प्रधानता होती हैउनके चित्र भी किसी प्रत्यक्ष कथा के बजाय एक ‘भाव-क्षेत्र’ का निर्माण करते हैंजिसमें दर्शक अपनी स्मृतियों और संवेदनाओं के साथ प्रवेश करता है। यही कारण है कि प्रत्येक दर्शक के लिए उनका अनुभव भिन्न और निजी हो जाता है।

धैर्य और गहनता से देखने पर स्पष्ट होता है कि अनिल शर्मा की अमूर्त अभिव्यक्ति केवल रंगों और रूपों का संयोजन नहींबल्कि एक गहन भाव-जगत का उद्घाटन है। यहाँ कलाकार अपनी अंतःचेतना को बिना किसी बंधन के व्यक्त करता है और दर्शक को उस अनुभव का सहभागी बना लेता है। उनकी संपूर्ण कलायात्रा विविध अनुभवों का एक जीवंत कोलाज हैजिससे गुजरना अपने आप में एक रोमांचक और आत्मीय अनुभव है। उनके चित्र इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि जब कला आत्मानुभूति से जुड़ती हैतो वह केवल दृश्य नहीं रह जाती—वह संवाद बन जाती है। प्राचीन घाटों की आभानगर-जीवन की चहल-पहलप्रकृति के शांत क्षण—ये सभी उनके कैनवस पर एक विशेष पारदर्शिता और तरलता के साथ उभरते हैं। प्रकाश और छाया का संतुलित प्रयोग उनके चित्रों को सजीव बनाता है। साथ हीउनकी कला स्थानीयता को एक वैश्विक अनुभव में रूपांतरित करती है—जहाँ हर दर्शक अपने अनुभवों का प्रतिबिंब देख सकता है। अनिल शर्मा के चित्रों में समय का एक मौन प्रवाह भी विद्यमान है। वे वर्तमान के साथ-साथ अतीत की स्मृतियों और भविष्य की संभावनाओं को भी समेटते हैं। पुराने भवनों और ऐतिहासिक स्थलों का चित्रण उनके लिए केवल दृश्यांकन नहींबल्कि उन स्थानों की आत्मा को पकड़ने का प्रयास है। इसीलिए उनके चित्रों में एक आत्मीय ऊष्मा और स्मृतिपरक संवेदना का गहन संचार दिखाई देता है। दृश्य और नगर-चित्रों से आगे बढ़कर उनकी अमूर्त रचनाएँ उनके भीतर के अनकहे भावों की अभिव्यक्ति बन जाती हैंजहाँ रूप स्पष्ट नहीं होतेपरंतु अनुभूति अत्यंत तीव्र होती है। यही उनके कला-संसार की विशिष्टता है—जहाँ दृश्य और अदृश्ययथार्थ और अमूर्तनदोनों समान रूप से सह-अस्तित्व में रहते हैं- संवेदनास्मृतिअनुभव और कल्पना के साथ।




















नेशनल यूथ फेस्टिवल (युनिफेस्ट) 2025-26

एसोसिएशन ऑफ इंडियन यूनिवर्सिटीज, नई दिल्ली द्वारा आयोजित 39वें इंटर-यूनिवर्सिटीज नेशनल यूथ फेस्टिवल 2025–26 का आयोजन - 'Kalai Saaral' 10 से 14 मार्च 2026 तक सत्यभामा इंस्टिट्यूट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी, चेन्नई में संपन्न हुआ जिसमें दृश्यकला से सम्बंधित प्रतियोगिताओं के लिए गठित तीन सदस्यीय निर्णायक मंडल में लखनऊ के डॉ. अवधेश मिश्र के साथ अल्मोड़ा के प्रो. शेखर जोशी तथा पुणे के अविनाश काटे शामिल थे। युनिफेस्ट के समापन समारोह में संस्थान की चांसलर डॉ मारियाज़ीना जॉन्सन और चेयरमैन डॉ मैरी जॉन्सन द्वारा निर्णायक मण्डल को सम्मानित किया गया।









International Seminar 
(Pluralism, Continuity and Global Dialogues in Indian Art)
School of Creative and Performing Arts, CSJM Kanpur University 
27-28 February 2026

छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालयकानपुर के स्कूल ऑफ क्रिएटिव एंड परफॉर्मिंग आर्ट्स में 27 एवं 28 फरवरी को “भारतीय कला में विविधतानिरंतरता और वैश्विक संवाद” विषयक अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का सफल आयोजन किया गया। संगोष्ठी में देश-विदेश के कला विशेषज्ञोंशिक्षाविदों एवं कलाकारों ने भारतीय कला की परंपरासमकालीन चुनौतियों तथा वैश्विक परिप्रेक्ष्य पर सार्थक विमर्श किया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि मुंबई के वरिष्ठ कलाकार सुहास बहुलकर और मुख्य वक्ता प्रख्यात कलाकार अवधेश मिश्र थे। कार्यक्रम के संरक्षक एवं प्रति कुलपति प्रो. सुधीर कुमार अवस्थी ने अपने संबोधन में कहा कि भारतीय कला केवल सौंदर्यबोध का माध्यम नहींबल्कि हमारी सांस्कृतिक चेतनाजीवन-दर्शन और सामाजिक अनुभवों का सजीव प्रतिबिंब है। आज भारतीय कलाकार लोक एवं पारंपरिक कलाओं को आधुनिक संदर्भों से जोड़ते हुए नई सृजनात्मक दिशाएँ स्थापित कर रहे हैं। मुख्य अतिथि सुप्रसिद्ध कलाकार सुहास बहुलकर ने भारतीय कला की प्राचीनता एवं उसकी अखंड परंपरा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि कला साधना निरंतर अनुभव और आत्मानुशीलन की प्रक्रिया है। उन्होंने चित्रकूट में निर्मित “राम दर्शन” को केवल एक मंदिर न मानते हुए कला की जीवंत पाठशाला बतायाजिससे प्रत्येक कलाकार को प्रेरणा ग्रहण करनी चाहिए। बीएचयू से पधारे बीज वक्ता प्रो. शांति स्वरूप सिन्हा ने भारतीय कला के ऐतिहासिक विकास क्रम को रेखांकित करते हुए प्रागैतिहासिक शैलचित्रोंअजंता की भित्ति चित्र परंपरा तथा चोलकालीन शिव तांडव मूर्तियों के उदाहरणों द्वारा भारतीय कला की निरंतरता को वैश्विक पहचान का आधार बताया। वहीं वक्ता प्रो. मनीष अरोड़ा ने पारंपरिक कला विधाओं को आधुनिक तकनीक से जोड़ने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि तकनीकी माध्यम कला को समाज के व्यापक वर्ग तक पहुँचाने में सहायक सिद्ध होंगे। चित्रकूट से आए डॉ. जयशंकर मिश्रा ने लोककलाओं को जनजीवन के उत्सव और सामूहिक संवेदना का प्रतीक बताया।

अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी के मुख्य वक्ता एवं कला दीर्घा, अंतर्राष्ट्रीय दृश्यकला पत्रिका के संपादक डॉ. अवधेश मिश्र ने संगोष्ठी के मूल विषय पर विचार व्यक्त करते हुए कहा कि कला स्वभावतः विविधतापूर्ण होती है, क्योंकि वह कलाकार के ज्ञान, अनुभव और कौशल से निर्मित होती है। यही विविधता कला को जीवंत बनाए रखती है तथा व्यक्ति, समाज और राष्ट्र के विकास क्रम के साथ उसकी निरंतरता सुनिश्चित करती है। डॉ. मिश्र ने कला की अवधारणा स्पष्ट करते हुए कहा कि जब किसी कार्य में सृजनात्मकता का समावेश हो जाता है, वही कला का रूप ग्रहण कर लेता है। कलाएँ कलाकार की पृष्ठभूमि, परिवेश और जीवनानुभवों से आत्मसात संस्कारों एवं मूल्यों की अभिव्यक्ति होती हैं। संवेदनाएँ जब मानसपटल पर संचित होकर अनुकूल वातावरण प्राप्त करती हैं, तब मौलिक रचना का जन्म होता है, जिसमें स्थानीयता अनिवार्य तत्व है। उन्होंने कहा कि आयातित संवेदनाओं पर आधारित रचनाएँ प्रायः प्रभावहीन हो जाती हैं तथा कलाकार अपनी सांस्कृतिक पहचान से दूर होने लगता है। उन्होंने यह भी कहा कि धर्म अथवा सत्ता के प्रभाव में कला अपने मूल उद्देश्यों से विचलित होकर केवल संदर्भों के चित्रण तक सीमित हो सकती है, जबकि शास्त्रीय कलाओं की वास्तविक उत्पत्ति लोकजीवन से हुई है और इसी कारण वे जनकल्याणकारी स्वरूप धारण करती हैं। वैश्विक कला संवाद पर चर्चा करते हुए डॉ. मिश्र ने हाल में आयोजित इंडिया आर्ट फेयर का उल्लेख करते हुए कहा कि ऐसे आयोजन वैश्विक संवाद की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास हैं, किंतु उनमें भारतीय संवेदनात्मक आधार को सुदृढ़ बनाए रखने की आवश्यकता है। उन्होंने मीडिया एवं कला समीक्षकों की भूमिका पर भी गंभीर चिंतन की आवश्यकता व्यक्त करते हुए मौलिक रचनाकारों को प्रोत्साहन देने पर बल दिया। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बढ़ते प्रभाव पर विचार रखते हुए मुख्य वक्ता ने कहा कि जिस प्रकार कैमरा और छापाकला को प्रारंभ में स्वीकारा नहीं गया था, किंतु बाद में उन्हें माध्यम के रूप में स्वीकार करने से कला का विस्तार हुआ, उसी प्रकार कृत्रिम बुद्धिमत्ता को भी उपकरण के रूप में अपनाया जाए तो यह सृजन प्रक्रिया में सहायक सिद्ध होगी। डॉ. मिश्र ने कला दीर्घा, अंतर्राष्ट्रीय दृश्यकला पत्रिका की स्थापना, उद्देश्यों एवं यात्रा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह पत्रिका स्थानीय संवेदनाओं को संरक्षित रखते हुए वैश्विक कला संवाद का सशक्त मंच बनी है तथा नई पीढ़ी के कलाकारों को दिशा प्रदान कर रही है। डॉ शकुंतला मिश्रा राष्ट्रीय पुनर्वास विश्वविद्यालय, लखनऊ के कलाचार्य डॉ अवधेश मिश्र ने अपने व्याख्यान में उत्तर प्रदेश के समकालीन कला परिदृश्य पर प्रकाश डालते हुए प्रदेश के विभिन्न कला केंद्रों एवं विशेष रूप से औद्योगिक नगर कानपुर में विकसित हो रहे सृजनात्मक वातावरण की सराहना की। गुरुकुल कला वीथिका की परंपरा और आचार्य सी. बरतरिया से लेकर आचार्य राम कंवर, आचार्य अभय द्विवेदी, आचार्य प्रेमा मिश्र, आचार्य प्रेम कुमारी मिश्र, आचार्य पूर्णिमा तिवारी, आचार्य हृदय गुप्ता, आचार्य ज्योति शुक्ला, आचार्य कुमुद बाला तथा आचार्य शुभम शिवा सहित अनेक कलाकारों के योगदान का उल्लेख किया गया। संगोष्ठी के सफल आयोजन में निदेशक डॉ. मिठाई लाल, डॉ. मंतोष यादव, डॉ. रणधीर, प्रिया मिश्रा एवं युवा कलाकारों की सक्रिय भूमिका की सराहना की गई, जिनके प्रयासों से कानपुर एक उभरते हुए कला केंद्र के रूप में स्थापित हो रहा है। कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के आचार्यगण, शोधार्थी, कलाकार, कलाप्रेमी एवं बड़ी संख्या में प्रतिभागी उपस्थित रहे।




























चित्रकला शिविर : महाकवि जयशंकर प्रसाद साहित्य संस्कृति महोत्सव 2026 
आयोजक : महाकवि जयशंकर प्रसाद ट्रस्ट, संस्कृति विभाग उत्तर प्रदेश, हिंदी एवं आधुनिक भारतीय भाषा विभाग, लविवि, ललित कला संकाय, लविवि, राज्य ललित कला अकादमी, उत्तर प्रदेश
25-27 फ़रवरी 2026, मालवीय उद्यान, लखनऊ विश्वविद्यालय



चम्पावत सरस कॉर्बेट महोत्सव 2026 की कला-कार्यशाला

उत्तराखण्ड की सांस्कृतिक धरती पर आयोजित चम्पावत सरस कॉर्बेट महोत्सव 2026 की विभिन्न सांस्कृतिक गतिविधियों के अंतर्गत संपन्न दो दिवसीय कला कार्यशाला (लोक और समकालीन कला) महोत्सव का आकर्षण रही। इस सृजनात्मक आयोजन का समन्वयन प्रख्यात चित्रकार तथा ‘कला दीर्घा’ अंतर्राष्ट्रीय दृश्य कला पत्रिका के संपादक डॉ. अवधेश मिश्र द्वारा किया गया। उनके मार्गदर्शन में आयोजित इस कार्यशाला में जहाँ सौ से अधिक प्रतिभागियों ने उत्साहपूर्वक भाग लेकर मधुबनी और समकालीन कला की बारीकियां सीखीं वहीं वैश्विक परिप्रेक्ष्य में स्थानीय संस्कृति के महत्त्व पर सार्थक संवाद हुआ। कार्यशाला का वातावरण, महोत्सव में हो रही कुमाऊंनी संगीत की रिमझिम बारिश के मध्य, सृजनात्मक ऊर्जा से परिपूर्ण रहा। डॉ. मिश्र ने प्रतिभागियों को कला में संवेदना का महत्त्व, स्थानीय सुगंध और ध्वनियों का कला सृजन में बहुविधि सार्थक प्रयोग, रंगों के संतुलन, रेखाओं की सटीकता, विषय चयन की संवेदनशीलता, संरचना की वैज्ञानिक समझ तथा अभिव्यक्ति की मौलिकता पर विस्तार से मार्गदर्शन दिया। उन्होंने अपने तीन दशकों के सृजनात्मक अनुभवों को साझा करते हुए यह स्पष्ट किया कि कला केवल भावनाओं की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि अनुशासन, समय प्रबंधन और नैतिक प्रतिबद्धता का समन्वित परिणाम है। उनके प्रेरक उद्बोधन ने युवा प्रतिभागियों में आत्मविश्वास और समर्पण की नई चेतना का संचार किया।

क्रियात्मक सत्रों में प्रतिभागियों को मधुबनी शैली के विभिन्न विषयों और तकनीकों का प्रत्यक्ष अभ्यास कराया गया। लोककला की पारंपरिक रेखाओं और प्रतीकों के साथ-साथ समकालीन चित्रण की स्वतंत्र अभिव्यक्ति को समझते हुए विद्यार्थियों ने अपनी कल्पनाशक्ति को रंगों के माध्यम से आकार दिया। कार्यशाला के अंत में प्रदर्शित कलाकृतियाँ प्रतिभागियों की सृजनात्मक प्रगति और सौंदर्यबोध की साक्षी बनीं, जिनकी उपस्थित जनों ने मुक्त कंठ से सराहना की। इस अवसर पर डॉ. शकुन्तला मिश्रा राष्ट्रीय पुनर्वास विश्वविद्यालय, लखनऊ के कलाचार्य डॉ अवधेश मिश्र द्वारा उत्तराखण्ड की पारंपरिक ऐपण कला सहित देश की विविध लोक शैलियों के सांस्कृतिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने विद्यार्थियों को रंग संयोजन और रेखांकन की सूक्ष्मताओं से परिचित कराया और यह बताया गया कि स्थानीय कला शैलियों के अभिप्रायों को प्रकारांतर से समकालीन कला और उपयोगी बस्तुओं के प्रयोग में लाकर उसकी ब्रांडिंग की जा सकती है और उसे कलाकारों के व्यक्तिगत विकास के साथ ही अर्थ व्यवस्था से जोड़ा जा सकता है। डॉ मिश्र द्वारा उत्तराखंड के कलाकार आचार्य रणवीर सिंह बिष्ट, आचार्य अवतार सिंह पंवार, मोहम्मद सलीम, पद्मश्री यशोधर मठपाल और आचार्य शेखर जोशी की कला-विशिष्टताओं की चर्चा की। इस संवाद ने प्रतिभागियों को अपनी जड़ों से जुड़े रहते हुए आधुनिक संवेदनाओं को अभिव्यक्त करने की प्रेरणा प्रदान की।

कार्यक्रम के अंतर्गत सुभाष चन्द्र बोस आवासीय विद्यालय के विद्यार्थियों के साथ एक विशेष संवाद सत्र भी आयोजित किया गया। इस सत्र में विद्यार्थियों को महान स्वतंत्रता सेनानी सुभाष चन्द्र बोस के जीवन-संघर्ष और राष्ट्रनिष्ठा से प्रेरणा लेने का संदेश दिया गया। आत्मविश्वास, अनुशासन और राष्ट्रीय दायित्वबोध को जीवन में अपनाने का आह्वान करते हुए उन्हें राष्ट्रनिर्माण में सक्रिय सहभागिता के लिए प्रेरित किया गया। विद्यार्थियों को बताया गया कि जीवन में धन और सुख-सुविधाओं से अधिक महत्त्व सृजन का है जो लोक कल्याण की भावना से ओतप्रोत होता है।

डॉ. मिश्र, जो ललित कला अकादेमी पुरस्कार और शिक्षा रत्न सम्मान सहित अनेक महत्त्वपूर्ण पुरस्कारों से सम्मानित हैं, ने इस कार्यशाला को न केवल प्रशिक्षण कार्यक्रम तक सीमित किया बल्कि इसे एक वैचारिक और सांस्कृतिक उत्सव का रूप प्रदान किया। कार्यक्रम में मुख्य शिक्षा अधिकारी श्री मेहरबान सिंह बिष्ट, सहायक परियोजना निदेशक विम्मी जोशी, प्रबंधक उद्योग पंकज तिवारी तथा अन्य गणमान्य व्यक्तियों, शिक्षकों और छात्र-छात्राओं की उपस्थिति ने आयोजन की गरिमा को और अधिक ऊँचाई प्रदान की। डॉ अवधेश मिश्र के सहयोगी डॉ. शकुन्तला मिश्रा राष्ट्रीय पुनर्वास विश्वविद्यालय, लखनऊ के ललित कला परास्नातक विद्यार्थी पुलक मिश्र और हिमांशु गुप्ता के साथ कुमाऊँ विश्वविद्यालय, अल्मोड़ा की छात्रा रही अपर्णा ने कार्यशाला के संयोजन में अतिउत्साहपूर्वक सहयोग किया। कार्यक्रम का समापन करते हुए चम्पावत सरस कॉर्बेट महोत्सव 2026 के मंच पर डॉ अवधेश मिश्र को आयोजकों द्वारा महोत्सव का स्मृति चिन्ह, सम्मानपत्र और स्थानीय शिल्पों का उपहार देकर सम्मानित किया गया। सहयोगी कलाकार और प्रतिभागी भी आयोजकों और डॉ अवधेश मिश्र द्वारा पुरस्कार और प्रमाणपत्र पाकर प्रसन्न हुए। यह दो दिवसीय कला कार्यशाला केवल रंगों और रेखाओं का अभ्यास और सृजन मात्र नहीं थी बल्कि परंपरा और आधुनिकता के बीच एक ऐसा सेतु बनी जिसने रचनाकारों के मन में सृजन, संस्कार और सामाजिक उत्तरदायित्व की चेतना को सुदृढ़ किया।

























कला का महापर्व : पिंकफेस्ट

अवधेश मिश्र

आप प्रवेश करेंगे एक ऐसे लोक में, जहाँ चित्रों की तानों का नाद समूचे परिवेश को गुंजायमान कर देता है; जहाँ सुरों के रंग मिलकर इन्द्रधनुष रचते हैं; जहाँ थाप पर थिरकती भंगिमाएँ मानवीय संवेगों का सम्प्रेषण करती हैं; जहाँ अभिनय स्मृति में बस जाने वाली कथाएँ रचता है और शब्द रेखाचित्र बनकर संवेदना की दीवारों पर उभर आते हैं। यही है कलाओं का महापर्व — ‘पिंकफेस्ट 2026’

राजस्थान की जीवंत संस्कृति और समृद्ध परंपराओं के आलोक में, दुनिया भर के विविध कलारूपों की सुन्दर, सरस और सजीव प्रस्तुतियों की यह बौछार तन को ही नहीं, मन और आत्मा को भी भिगो देती है। तीन दिवसीय यह आयोजन — 6 से 8 फरवरी 2026, राजस्थान इंटरनेशनल सेंटर, जयपुर में  कला, साहित्य और सांस्कृतिक परंपराओं की विविध प्रस्तुतियों से समृद्ध होगा। कला-प्रदर्शनियाँ होंगी, विचारोत्तेजक संवाद होंगे, रचनात्मक कार्यशालाएँ होंगी और प्रदर्शनकारी कलाओं के ऐसे सजीव रूप सामने आएँगे, जो समय की स्मृति में अंकित हो जाएँगे।

यहाँ कलाकार, लेखक, चिंतक और संस्कृति-प्रेमी एकत्र होंगे — ऐसे मनीषी, जिनका ज्ञान, कौशल और अभिव्यक्ति की सरसता भाषा की सीमाओं को लाँघकर सीधे आत्मा को स्पंदित करती है। पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक दृष्टिकोण का यह सुन्दर सम्मिलन प्रतिभाओं के बीच गहन संवाद का एक ऐसा ताना-बाना बुनता है, जिसे ओढ़कर हम केवल दर्शक बनकर नहीं लौटते बल्कि अपनी अक्षुण्ण संस्कृति, ज्ञान-परंपरा और सृजनशील मनीषा के पथिक बन जाते हैं।

पिंकफेस्ट’ कला और संस्कृति के माध्यम से हमारी परंपराओं और विशेषज्ञता को नए प्रतिमान देने का अवसर है — उन्हें विस्तार देने का और नई दुनिया के साथ संवाद स्थापित करने का अवसर। यह मंच न केवल स्थापित कलाकारों को गरिमामय उपस्थिति प्रदान करता है, बल्कि युवा रचनाकारों के लिए भी ऐसा अनुकूल वातावरण रचता है जहाँ उनकी आवाज़ सुनी जाती है और उनकी प्रतिभा को पहचान मिलती है।

विश्वभर के कलाकारों और मर्मज्ञों को एक साथ लाकर पिंकफेस्ट सांस्कृतिक संवेदनशीलता को विकसित करता है और सौन्दर्यबोध से हम सब को जोड़ता है। यह हमारे भीतर विद्यमान कल्पना के रंगों को और चटक करता है, हमारी परंपराओं की जड़ों को पुनर्जीवित करता है और हमें यह स्मरण कराता है कि कला और संस्कृति ही वे सूक्ष्म, किंतु सुदृढ़ धागे हैं, जो सम्पूर्ण मानवता को एक सूत्र में बाँधते हैं।

इसलिए आइये हम सहभागी बनें ‘पिंकफेस्ट 2026’ के। 

https://www.pinkfest.in/






































































































 

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