KALA VIMARSH 2026
विश्वकला की आधुनिक यात्रा का प्रामाणिक दस्तावेज़
आधुनिक कला आन्दोलन
अवधेश मिश्र
डॉ ज्योतिष जोशी की पुस्तक ‘आधुनिक कला
आन्दोलन’ वस्तुतः विश्वकला की आधुनिक यात्रा का एक अत्यंत गंभीर, सुव्यवस्थित, शोधपरक और
प्रामाणिक दस्तावेज़ है। यह केवल कला-इतिहास का क्रमबद्ध विवरण नहीं, बल्कि आधुनिक
संवेदना, विचार-दृष्टि
और कलात्मक चेतना के विकास की एक व्यापक बौद्धिक यात्रा है। 1400 ईस्वी से लेकर 1965 तक के विस्तृत
कालखंड को समेटते हुए यह पुस्तक पाठक को यूरोप के पुनर्जागरण से लेकर भारतीय
आधुनिक कला के विविध आंदोलनों तक एक ऐसे प्रवाह में ले जाती है, जहाँ कला केवल
सौंदर्य का विषय नहीं रह जाती,
बल्कि सभ्यता, समाज, राजनीति, दर्शन और मनुष्य की
आंतरिक बेचैनी का जीवंत दस्तावेज़ बन जाती है।
डॉ ज्योतिष जोशी स्वयं साहित्य, कला और रंगमंच के
प्रतिष्ठित आलोचक हैं। बिहार के गोपालगंज जनपद के धर्मगता ग्राम में 6 अप्रैल 1965 को जन्मे डॉ जोशी
ने दिल्ली विश्वविद्यालय और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त
की। ललित कला अकादमी, नई दिल्ली
में संपादक और सचिव जैसे महत्त्वपूर्ण पदों पर रहते हुए उन्होंने न केवल प्रशासनिक
स्तर पर सार्थक कार्य किए, बल्कि
भारतीय और अंतरराष्ट्रीय कला-जगत के साथ गहरे संवाद स्थापित किए। कलाकारों, समीक्षकों और
कला-संस्थानों से उनका जीवंत संपर्क उनके लेखन को असाधारण विश्वसनीयता प्रदान करता
है। यही कारण है कि ‘आधुनिक कला आन्दोलन’ केवल पुस्तकीय जानकारी का संकलन नहीं, बल्कि एक अनुभवी
कला-द्रष्टा की अंतरंग समझ का परिणाम प्रतीत होती है।
पुस्तक का सबसे बड़ा और महत्त्वपूर्ण
पक्ष इसका सुविचारित काल-विभाजन और क्रमबद्ध प्रस्तुतीकरण है। डॉ जोशी आधुनिक कला
की शुरुआत को केवल उन्नीसवीं शताब्दी तक सीमित नहीं रखते, बल्कि उसके संकेत 1400 ईस्वी के
पुनर्जागरण काल से खोजते हैं,
जब यूरोप में चर्च और धर्म की कठोर सीमाओं से कला को मुक्ति मिलने लगी।
यूरोपीय कला-इतिहासकारों के अनुसार 500 ईस्वी तक
का समय प्राचीन कला का काल है,
जिसमें मिस्री, यूनानी, रोमन और
हेलेनिस्टिक कलाओं का उल्लेख मिलता है,
जबकि 500 से 1550 तक का लगभग एक
हजार वर्ष मध्यकालीन कला का समय माना गया,
जिसमें बाइज़ेंटाइन, गोथिक और
रोमनस्क जैसी कलाशैलियाँ विकसित हुईं। डॉ जोशी इन ऐतिहासिक अवस्थाओं को केवल
नामोल्लेख तक सीमित नहीं रखते,
बल्कि यह स्पष्ट करते हैं कि किस प्रकार सामाजिक संरचनाएँ कला की दिशा
निर्धारित करती हैं।
पुस्तक का पहला खंड ‘पश्चिमी कला
आन्दोलन’ आधुनिक कला के उद्भव और विकास को अत्यंत सुसंगत रूप में प्रस्तुत करता
है। पुनर्जागरणकालीन कला से आरंभ होकर बारोक,
रोकोको, नवशास्त्रवाद, स्वच्छन्दतावाद, यथार्थवाद, प्रभाववाद, नव-प्रभाववाद, उत्तर-प्रभाववाद, प्रतीकवाद, फाववाद, अभिव्यंजनावाद, घनवाद, भविष्यवाद, अमूर्त कला, दादावाद और
अतियथार्थवाद तक की यात्रा यहाँ विस्तार से मिलती है। विशेष बात यह है कि लेखक इन
आंदोलनों को केवल तिथियों और घोषणापत्रों में नहीं बाँधते, बल्कि उनकी वैचारिक
पृष्ठभूमि, सामाजिक
परिस्थितियों और कलाकारों की व्यक्तिगत रचनात्मक बेचैनी के साथ जोड़कर देखते हैं।
पुनर्जागरण के संदर्भ में लियोनार्दो
दा विंची, माइकेल
एंजेलो और राफेल जैसे कलाकारों का उल्लेख करते हुए लेखक दिखाते हैं कि किस प्रकार
मनुष्य पुनः कला के केंद्र में स्थापित हुआ। 1516 में फ्रांसिस प्रथम द्वारा लियोनार्दो दा विंची को अपने
दरबार में आमंत्रित करना केवल एक कलाकार का सम्मान नहीं, बल्कि कला के बदलते
राजनीतिक महत्व का संकेत था। पुनर्जागरण ने ईश्वर-केंद्रित मध्यकालीन दृष्टि के
स्थान पर मनुष्य, तर्क और
अनुभव को प्रतिष्ठित किया, और यही
आधुनिकता का वास्तविक आरंभ था।
बारोक कला की चर्चा में लेखक बताते हैं
कि यह केवल चित्रकला नहीं, बल्कि
वास्तु, मूर्तिकला
और संगीत तक फैली एक व्यापक शैली थी,
जिसमें मुक्त भाव, अलंकरण, नाटकीयता और भित्ति
चित्रों की प्रधानता थी। कैथोलिक चर्च ने इसे प्रोत्साहन दिया क्योंकि वह कला को
धार्मिक अनुभव का प्रत्यक्ष और भावनात्मक माध्यम बनाना चाहता था। माइकेल एंजेलो, लोरेंजो बर्निनी, रेम्ब्रांट, डिएगो वेलाज़्केज़
और पीटर पॉल रूबेंस जैसे कलाकारों की कृतियों के माध्यम से लेखक यह स्पष्ट करते
हैं कि बारोक कला में दर्शक को केवल देखने नहीं, भीतर से प्रभावित होने के लिए आमंत्रित किया जाता था।
इसी प्रकार रोकोको कला का विवेचन करते
हुए डॉ जोशी बताते हैं कि यह 1720 के आसपास
पेरिस में विकसित हुई एक दरबारी और आंतरिक सज्जा-प्रधान शैली थी, जिसमें रंगीन लय, कोमलता, घुमावदार रेखाएँ और
अलंकरण प्रमुख थे। फ्रांसीसी शब्द ‘रोकाय’ से निकला ‘रोकोको’ शब्द स्वयं इसकी
शैलीगत प्रकृति को व्यक्त करता है। लेखक यह भी संकेत करते हैं कि यद्यपि यह दरबारी
संस्कृति की कला थी, फिर भी कई
कलाकारों ने उसमें स्वतंत्रता की संभावनाएँ खोजीं। यह विवेचन पुस्तक को केवल
इतिहास नहीं, संवेदना का
पाठ बना देता है।
नवशास्त्रवाद के अध्याय में लेखक ने 1760 से 1830 तक के उस संक्रमणकाल को समझाया है जब रोकोको की कृत्रिमता के विरुद्ध यूनानी आदर्शों की ओर लौटने की आकांक्षा पैदा हुई। इटली के हरकुलेनियम और पोम्पेई में हुए पुरातात्त्विक उत्खननों से प्राप्त यूनानी मूर्तियों ने यूरोप की कला-दृष्टि बदल दी। जैक लुई डेविड जैसे कलाकारों ने आदर्श मानव शरीर, नैतिक गंभीरता और शास्त्रीय संतुलन को चित्रकला का आधार बनाया। यह अध्याय यह सिद्ध करता है कि कला कभी निर्वात में जन्म नहीं लेती; वह इतिहास, राजनीति और सांस्कृतिक स्मृति के बीच अपना आकार ग्रहण करती है।
डॉ जोशी आधुनिकता की वास्तविक शुरुआत
स्वच्छन्दतावाद से मानते हैं। उनका मत है कि 1800 के आसपास आरंभ हुए रोमांटिसिज़्म ने कलाकार को पहली बार
अपनी निजी संवेदना, विद्रोह और
आत्मानुभूति को अभिव्यक्त करने का साहस दिया। थियोडोर जेरिको की प्रसिद्ध कृति
*‘राफ्ट ऑफ द मेडूसा’* इस दिशा में निर्णायक मानी जाती है। इसके बाद 1840 से 1870 तक यथार्थवाद आया, जिसने आदर्शवाद को
अस्वीकार कर जीवन की कठोर वास्तविकताओं को चित्रित किया। कूर्बे और डोमिये जैसे
कलाकारों ने कला को राजदरबार से निकालकर सामान्य मनुष्य के जीवन में स्थापित किया।
प्रभाववाद, नव-प्रभाववाद और
उत्तर-प्रभाववाद की चर्चा पुस्तक का अत्यंत रोचक भाग है। प्रकाश, क्षणिकता और दृश्य
अनुभव को केंद्र में रखकर प्रभाववाद ने चित्रकला की भाषा बदल दी। इसके बाद
प्रतीकवाद ने दृश्य के पीछे छिपे अर्थ को महत्त्व दिया और यह आग्रह किया कि कला
प्रत्यक्ष से अधिक संकेतात्मक हो। फाववाद में हेनरी मातिस ने रंग को स्वतंत्र
सत्ता दी, अभिव्यंजनावाद
में एडवर्ड मुँक ने मनुष्य की आंतरिक चीख को दृश्य रूप दिया, घनवाद में पिकासो
ने वस्तु की संरचना को तोड़ा,
और दादावाद तथा अतियथार्थवाद ने तर्क के विरुद्ध अवचेतन और विसंगति को
प्रतिष्ठित किया। इन सभी आंदोलनों का विवेचन लेखक ने सरल, प्रवाहपूर्ण और
बौद्धिक रूप से समृद्ध भाषा में किया है।
पुस्तक की एक विशिष्ट विशेषता इसका
भारतीय कला की ओर विस्तार है। 1903 से 1947 तक की भारतीय कला, बंगाल स्कूल, कलकत्ता आर्टिस्ट्स
ग्रुप, प्रोग्रेसिव
आर्टिस्ट्स ग्रुप, बंबई
आर्टिस्ट्स ग्रुप, दिल्ली
शिल्पी चक्र, चोला मंडल
आर्टिस्ट्स विलेज, ग्रुप 1890 आदि का विस्तृत
विवेचन यह स्पष्ट करता है कि लेखक भारतीय आधुनिकता को पश्चिम की छाया के रूप में
नहीं देखते, बल्कि उसे
अपने स्वतंत्र सांस्कृतिक संघर्ष और आत्मनिर्माण की प्रक्रिया मानते हैं। भारतीय
कलाकारों की वैचारिक पृष्ठभूमि,
औपनिवेशिक अनुभव, स्वाधीनता
आंदोलन और आधुनिकता के साथ उनका द्वंद्व अत्यंत संवेदनशील ढंग से प्रस्तुत किया
गया है।
भाषा की दृष्टि से भी यह पुस्तक
उल्लेखनीय है। आधुनिक कला पर उपलब्ध अधिकांश साहित्य या तो अत्यधिक तकनीकी है या
बिखरे हुए संदर्भों में मिलता है,
जिससे पाठक को न तो क्रमबद्ध समझ बनती है और न बौद्धिक प्रवाह। डॉ ज्योतिष
जोशी की भाषा विद्वत्तापूर्ण होते हुए भी सहज, प्रांजल और सुपाठ्य है। पाठक कला-आंदोलनों को केवल पढ़ता
नहीं, मानो
चलचित्र की तरह देखता चलता है। कलाकारों की रचना-प्रक्रिया, उनकी संवेदना, विचार-दृष्टि और
समय की हलचल पुस्तक में इस प्रकार उपस्थित होती है कि इतिहास जीवित अनुभव बन जाता
है।
वस्तुतः ‘आधुनिक कला आन्दोलन’ कलाकारों, कला-आलोचकों, इतिहासकारों, शोधार्थियों और
कला-अध्येताओं के लिए एक अनिवार्य पुस्तक है। यह केवल कला-इतिहास की जानकारी नहीं
देती, बल्कि यह
सिखाती है कि कला को कैसे पढ़ा जाए,
उसके भीतर समय, समाज और
मनुष्य की चेतना को कैसे पहचाना जाए। डॉ ज्योतिष जोशी ने इस पुस्तक के माध्यम से
आधुनिक कला की जटिल यात्रा को न केवल सरल बनाया है, बल्कि उसे बौद्धिक गरिमा भी प्रदान की है। यह पुस्तक
आधुनिकता की केवल समीक्षा नहीं,
उसकी आत्मा की खोज है। इसलिए इसे पढ़ना कला का इतिहास पढ़ना भर नहीं, बल्कि मनुष्य की
रचनात्मक स्वतंत्रता की यात्रा को समझना है। यही इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि है।
पुस्तक : आधुनिक कला आन्दोलन (विश्वकला
की आधुनिक यात्रा : 1400 – 1965), लेखक : डॉ ज्योतिष जोशी, प्रकाशक : राजकमल
प्रकाशन प्रा. लि., मूल्य रू 495/-




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