Kala Paridrishya 2026


International Seminar 
(Pluralism, Continuity and Global Dialogues in Indian Art)
School of Creative and Performing Arts, CSJM Kanpur University 
27-28 February 2026

छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालयकानपुर के स्कूल ऑफ क्रिएटिव एंड परफॉर्मिंग आर्ट्स में 27 एवं 28 फरवरी को “भारतीय कला में विविधतानिरंतरता और वैश्विक संवाद” विषयक अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का सफल आयोजन किया गया। संगोष्ठी में देश-विदेश के कला विशेषज्ञोंशिक्षाविदों एवं कलाकारों ने भारतीय कला की परंपरासमकालीन चुनौतियों तथा वैश्विक परिप्रेक्ष्य पर सार्थक विमर्श किया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि मुंबई के वरिष्ठ कलाकार सुहास बहुलकर और मुख्य वक्ता प्रख्यात कलाकार अवधेश मिश्र थे। कार्यक्रम के संरक्षक एवं प्रति कुलपति प्रो. सुधीर कुमार अवस्थी ने अपने संबोधन में कहा कि भारतीय कला केवल सौंदर्यबोध का माध्यम नहींबल्कि हमारी सांस्कृतिक चेतनाजीवन-दर्शन और सामाजिक अनुभवों का सजीव प्रतिबिंब है। आज भारतीय कलाकार लोक एवं पारंपरिक कलाओं को आधुनिक संदर्भों से जोड़ते हुए नई सृजनात्मक दिशाएँ स्थापित कर रहे हैं। मुख्य अतिथि सुप्रसिद्ध कलाकार सुहास बहुलकर ने भारतीय कला की प्राचीनता एवं उसकी अखंड परंपरा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि कला साधना निरंतर अनुभव और आत्मानुशीलन की प्रक्रिया है। उन्होंने चित्रकूट में निर्मित “राम दर्शन” को केवल एक मंदिर न मानते हुए कला की जीवंत पाठशाला बतायाजिससे प्रत्येक कलाकार को प्रेरणा ग्रहण करनी चाहिए। बीएचयू से पधारे बीज वक्ता प्रो. शांति स्वरूप सिन्हा ने भारतीय कला के ऐतिहासिक विकास क्रम को रेखांकित करते हुए प्रागैतिहासिक शैलचित्रोंअजंता की भित्ति चित्र परंपरा तथा चोलकालीन शिव तांडव मूर्तियों के उदाहरणों द्वारा भारतीय कला की निरंतरता को वैश्विक पहचान का आधार बताया। वहीं वक्ता प्रो. मनीष अरोड़ा ने पारंपरिक कला विधाओं को आधुनिक तकनीक से जोड़ने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि तकनीकी माध्यम कला को समाज के व्यापक वर्ग तक पहुँचाने में सहायक सिद्ध होंगे। चित्रकूट से आए डॉ. जयशंकर मिश्रा ने लोककलाओं को जनजीवन के उत्सव और सामूहिक संवेदना का प्रतीक बताया।

अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी के मुख्य वक्ता एवं कला दीर्घा, अंतर्राष्ट्रीय दृश्यकला पत्रिका के संपादक डॉ. अवधेश मिश्र ने संगोष्ठी के मूल विषय पर विचार व्यक्त करते हुए कहा कि कला स्वभावतः विविधतापूर्ण होती है, क्योंकि वह कलाकार के ज्ञान, अनुभव और कौशल से निर्मित होती है। यही विविधता कला को जीवंत बनाए रखती है तथा व्यक्ति, समाज और राष्ट्र के विकास क्रम के साथ उसकी निरंतरता सुनिश्चित करती है। डॉ. मिश्र ने कला की अवधारणा स्पष्ट करते हुए कहा कि जब किसी कार्य में सृजनात्मकता का समावेश हो जाता है, वही कला का रूप ग्रहण कर लेता है। कलाएँ कलाकार की पृष्ठभूमि, परिवेश और जीवनानुभवों से आत्मसात संस्कारों एवं मूल्यों की अभिव्यक्ति होती हैं। संवेदनाएँ जब मानसपटल पर संचित होकर अनुकूल वातावरण प्राप्त करती हैं, तब मौलिक रचना का जन्म होता है, जिसमें स्थानीयता अनिवार्य तत्व है। उन्होंने कहा कि आयातित संवेदनाओं पर आधारित रचनाएँ प्रायः प्रभावहीन हो जाती हैं तथा कलाकार अपनी सांस्कृतिक पहचान से दूर होने लगता है। उन्होंने यह भी कहा कि धर्म अथवा सत्ता के प्रभाव में कला अपने मूल उद्देश्यों से विचलित होकर केवल संदर्भों के चित्रण तक सीमित हो सकती है, जबकि शास्त्रीय कलाओं की वास्तविक उत्पत्ति लोकजीवन से हुई है और इसी कारण वे जनकल्याणकारी स्वरूप धारण करती हैं। वैश्विक कला संवाद पर चर्चा करते हुए डॉ. मिश्र ने हाल में आयोजित इंडिया आर्ट फेयर का उल्लेख करते हुए कहा कि ऐसे आयोजन वैश्विक संवाद की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास हैं, किंतु उनमें भारतीय संवेदनात्मक आधार को सुदृढ़ बनाए रखने की आवश्यकता है। उन्होंने मीडिया एवं कला समीक्षकों की भूमिका पर भी गंभीर चिंतन की आवश्यकता व्यक्त करते हुए मौलिक रचनाकारों को प्रोत्साहन देने पर बल दिया। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बढ़ते प्रभाव पर विचार रखते हुए मुख्य वक्ता ने कहा कि जिस प्रकार कैमरा और छापाकला को प्रारंभ में स्वीकारा नहीं गया था, किंतु बाद में उन्हें माध्यम के रूप में स्वीकार करने से कला का विस्तार हुआ, उसी प्रकार कृत्रिम बुद्धिमत्ता को भी उपकरण के रूप में अपनाया जाए तो यह सृजन प्रक्रिया में सहायक सिद्ध होगी। डॉ. मिश्र ने कला दीर्घा, अंतर्राष्ट्रीय दृश्यकला पत्रिका की स्थापना, उद्देश्यों एवं यात्रा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह पत्रिका स्थानीय संवेदनाओं को संरक्षित रखते हुए वैश्विक कला संवाद का सशक्त मंच बनी है तथा नई पीढ़ी के कलाकारों को दिशा प्रदान कर रही है। डॉ शकुंतला मिश्रा राष्ट्रीय पुनर्वास विश्वविद्यालय, लखनऊ के कलाचार्य डॉ अवधेश मिश्र ने अपने व्याख्यान में उत्तर प्रदेश के समकालीन कला परिदृश्य पर प्रकाश डालते हुए प्रदेश के विभिन्न कला केंद्रों एवं विशेष रूप से औद्योगिक नगर कानपुर में विकसित हो रहे सृजनात्मक वातावरण की सराहना की। गुरुकुल कला वीथिका की परंपरा और आचार्य सी. बरतरिया से लेकर आचार्य राम कंवर, आचार्य अभय द्विवेदी, आचार्य प्रेमा मिश्र, आचार्य प्रेम कुमारी मिश्र, आचार्य पूर्णिमा तिवारी, आचार्य हृदय गुप्ता, आचार्य ज्योति शुक्ला, आचार्य कुमुद बाला तथा आचार्य शुभम शिवा सहित अनेक कलाकारों के योगदान का उल्लेख किया गया। संगोष्ठी के सफल आयोजन में निदेशक डॉ. मिठाई लाल, डॉ. मंतोष यादव, डॉ. रणधीर, प्रिया मिश्रा एवं युवा कलाकारों की सक्रिय भूमिका की सराहना की गई, जिनके प्रयासों से कानपुर एक उभरते हुए कला केंद्र के रूप में स्थापित हो रहा है। कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के आचार्यगण, शोधार्थी, कलाकार, कलाप्रेमी एवं बड़ी संख्या में प्रतिभागी उपस्थित रहे।




























चित्रकला शिविर : महाकवि जयशंकर प्रसाद साहित्य संस्कृति महोत्सव 2026 
आयोजक : महाकवि जयशंकर प्रसाद ट्रस्ट, संस्कृति विभाग उत्तर प्रदेश, हिंदी एवं आधुनिक भारतीय भाषा विभाग, लविवि, ललित कला संकाय, लविवि, राज्य ललित कला अकादमी, उत्तर प्रदेश
25-27 फ़रवरी 2026, मालवीय उद्यान, लखनऊ विश्वविद्यालय



चम्पावत सरस कॉर्बेट महोत्सव 2026 की कला-कार्यशाला

उत्तराखण्ड की सांस्कृतिक धरती पर आयोजित चम्पावत सरस कॉर्बेट महोत्सव 2026 की विभिन्न सांस्कृतिक गतिविधियों के अंतर्गत संपन्न दो दिवसीय कला कार्यशाला (लोक और समकालीन कला) महोत्सव का आकर्षण रही। इस सृजनात्मक आयोजन का समन्वयन प्रख्यात चित्रकार तथा ‘कला दीर्घा’ अंतर्राष्ट्रीय दृश्य कला पत्रिका के संपादक डॉ. अवधेश मिश्र द्वारा किया गया। उनके मार्गदर्शन में आयोजित इस कार्यशाला में जहाँ सौ से अधिक प्रतिभागियों ने उत्साहपूर्वक भाग लेकर मधुबनी और समकालीन कला की बारीकियां सीखीं वहीं वैश्विक परिप्रेक्ष्य में स्थानीय संस्कृति के महत्त्व पर सार्थक संवाद हुआ। कार्यशाला का वातावरण, महोत्सव में हो रही कुमाऊंनी संगीत की रिमझिम बारिश के मध्य, सृजनात्मक ऊर्जा से परिपूर्ण रहा। डॉ. मिश्र ने प्रतिभागियों को कला में संवेदना का महत्त्व, स्थानीय सुगंध और ध्वनियों का कला सृजन में बहुविधि सार्थक प्रयोग, रंगों के संतुलन, रेखाओं की सटीकता, विषय चयन की संवेदनशीलता, संरचना की वैज्ञानिक समझ तथा अभिव्यक्ति की मौलिकता पर विस्तार से मार्गदर्शन दिया। उन्होंने अपने तीन दशकों के सृजनात्मक अनुभवों को साझा करते हुए यह स्पष्ट किया कि कला केवल भावनाओं की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि अनुशासन, समय प्रबंधन और नैतिक प्रतिबद्धता का समन्वित परिणाम है। उनके प्रेरक उद्बोधन ने युवा प्रतिभागियों में आत्मविश्वास और समर्पण की नई चेतना का संचार किया।

क्रियात्मक सत्रों में प्रतिभागियों को मधुबनी शैली के विभिन्न विषयों और तकनीकों का प्रत्यक्ष अभ्यास कराया गया। लोककला की पारंपरिक रेखाओं और प्रतीकों के साथ-साथ समकालीन चित्रण की स्वतंत्र अभिव्यक्ति को समझते हुए विद्यार्थियों ने अपनी कल्पनाशक्ति को रंगों के माध्यम से आकार दिया। कार्यशाला के अंत में प्रदर्शित कलाकृतियाँ प्रतिभागियों की सृजनात्मक प्रगति और सौंदर्यबोध की साक्षी बनीं, जिनकी उपस्थित जनों ने मुक्त कंठ से सराहना की। इस अवसर पर डॉ. शकुन्तला मिश्रा राष्ट्रीय पुनर्वास विश्वविद्यालय, लखनऊ के कलाचार्य डॉ अवधेश मिश्र द्वारा उत्तराखण्ड की पारंपरिक ऐपण कला सहित देश की विविध लोक शैलियों के सांस्कृतिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने विद्यार्थियों को रंग संयोजन और रेखांकन की सूक्ष्मताओं से परिचित कराया और यह बताया गया कि स्थानीय कला शैलियों के अभिप्रायों को प्रकारांतर से समकालीन कला और उपयोगी बस्तुओं के प्रयोग में लाकर उसकी ब्रांडिंग की जा सकती है और उसे कलाकारों के व्यक्तिगत विकास के साथ ही अर्थ व्यवस्था से जोड़ा जा सकता है। डॉ मिश्र द्वारा उत्तराखंड के कलाकार आचार्य रणवीर सिंह बिष्ट, आचार्य अवतार सिंह पंवार, मोहम्मद सलीम, पद्मश्री यशोधर मठपाल और आचार्य शेखर जोशी की कला-विशिष्टताओं की चर्चा की। इस संवाद ने प्रतिभागियों को अपनी जड़ों से जुड़े रहते हुए आधुनिक संवेदनाओं को अभिव्यक्त करने की प्रेरणा प्रदान की।

कार्यक्रम के अंतर्गत सुभाष चन्द्र बोस आवासीय विद्यालय के विद्यार्थियों के साथ एक विशेष संवाद सत्र भी आयोजित किया गया। इस सत्र में विद्यार्थियों को महान स्वतंत्रता सेनानी सुभाष चन्द्र बोस के जीवन-संघर्ष और राष्ट्रनिष्ठा से प्रेरणा लेने का संदेश दिया गया। आत्मविश्वास, अनुशासन और राष्ट्रीय दायित्वबोध को जीवन में अपनाने का आह्वान करते हुए उन्हें राष्ट्रनिर्माण में सक्रिय सहभागिता के लिए प्रेरित किया गया। विद्यार्थियों को बताया गया कि जीवन में धन और सुख-सुविधाओं से अधिक महत्त्व सृजन का है जो लोक कल्याण की भावना से ओतप्रोत होता है।

डॉ. मिश्र, जो ललित कला अकादेमी पुरस्कार और शिक्षा रत्न सम्मान सहित अनेक महत्त्वपूर्ण पुरस्कारों से सम्मानित हैं, ने इस कार्यशाला को न केवल प्रशिक्षण कार्यक्रम तक सीमित किया बल्कि इसे एक वैचारिक और सांस्कृतिक उत्सव का रूप प्रदान किया। कार्यक्रम में मुख्य शिक्षा अधिकारी श्री मेहरबान सिंह बिष्ट, सहायक परियोजना निदेशक विम्मी जोशी, प्रबंधक उद्योग पंकज तिवारी तथा अन्य गणमान्य व्यक्तियों, शिक्षकों और छात्र-छात्राओं की उपस्थिति ने आयोजन की गरिमा को और अधिक ऊँचाई प्रदान की। डॉ अवधेश मिश्र के सहयोगी डॉ. शकुन्तला मिश्रा राष्ट्रीय पुनर्वास विश्वविद्यालय, लखनऊ के ललित कला परास्नातक विद्यार्थी पुलक मिश्र और हिमांशु गुप्ता के साथ कुमाऊँ विश्वविद्यालय, अल्मोड़ा की छात्रा रही अपर्णा ने कार्यशाला के संयोजन में अतिउत्साहपूर्वक सहयोग किया। कार्यक्रम का समापन करते हुए चम्पावत सरस कॉर्बेट महोत्सव 2026 के मंच पर डॉ अवधेश मिश्र को आयोजकों द्वारा महोत्सव का स्मृति चिन्ह, सम्मानपत्र और स्थानीय शिल्पों का उपहार देकर सम्मानित किया गया। सहयोगी कलाकार और प्रतिभागी भी आयोजकों और डॉ अवधेश मिश्र द्वारा पुरस्कार और प्रमाणपत्र पाकर प्रसन्न हुए। यह दो दिवसीय कला कार्यशाला केवल रंगों और रेखाओं का अभ्यास और सृजन मात्र नहीं थी बल्कि परंपरा और आधुनिकता के बीच एक ऐसा सेतु बनी जिसने रचनाकारों के मन में सृजन, संस्कार और सामाजिक उत्तरदायित्व की चेतना को सुदृढ़ किया।

























कला का महापर्व : पिंकफेस्ट

अवधेश मिश्र

आप प्रवेश करेंगे एक ऐसे लोक में, जहाँ चित्रों की तानों का नाद समूचे परिवेश को गुंजायमान कर देता है; जहाँ सुरों के रंग मिलकर इन्द्रधनुष रचते हैं; जहाँ थाप पर थिरकती भंगिमाएँ मानवीय संवेगों का सम्प्रेषण करती हैं; जहाँ अभिनय स्मृति में बस जाने वाली कथाएँ रचता है और शब्द रेखाचित्र बनकर संवेदना की दीवारों पर उभर आते हैं। यही है कलाओं का महापर्व — ‘पिंकफेस्ट 2026’

राजस्थान की जीवंत संस्कृति और समृद्ध परंपराओं के आलोक में, दुनिया भर के विविध कलारूपों की सुन्दर, सरस और सजीव प्रस्तुतियों की यह बौछार तन को ही नहीं, मन और आत्मा को भी भिगो देती है। तीन दिवसीय यह आयोजन — 6 से 8 फरवरी 2026, राजस्थान इंटरनेशनल सेंटर, जयपुर में  कला, साहित्य और सांस्कृतिक परंपराओं की विविध प्रस्तुतियों से समृद्ध होगा। कला-प्रदर्शनियाँ होंगी, विचारोत्तेजक संवाद होंगे, रचनात्मक कार्यशालाएँ होंगी और प्रदर्शनकारी कलाओं के ऐसे सजीव रूप सामने आएँगे, जो समय की स्मृति में अंकित हो जाएँगे।

यहाँ कलाकार, लेखक, चिंतक और संस्कृति-प्रेमी एकत्र होंगे — ऐसे मनीषी, जिनका ज्ञान, कौशल और अभिव्यक्ति की सरसता भाषा की सीमाओं को लाँघकर सीधे आत्मा को स्पंदित करती है। पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक दृष्टिकोण का यह सुन्दर सम्मिलन प्रतिभाओं के बीच गहन संवाद का एक ऐसा ताना-बाना बुनता है, जिसे ओढ़कर हम केवल दर्शक बनकर नहीं लौटते बल्कि अपनी अक्षुण्ण संस्कृति, ज्ञान-परंपरा और सृजनशील मनीषा के पथिक बन जाते हैं।

पिंकफेस्ट’ कला और संस्कृति के माध्यम से हमारी परंपराओं और विशेषज्ञता को नए प्रतिमान देने का अवसर है — उन्हें विस्तार देने का और नई दुनिया के साथ संवाद स्थापित करने का अवसर। यह मंच न केवल स्थापित कलाकारों को गरिमामय उपस्थिति प्रदान करता है, बल्कि युवा रचनाकारों के लिए भी ऐसा अनुकूल वातावरण रचता है जहाँ उनकी आवाज़ सुनी जाती है और उनकी प्रतिभा को पहचान मिलती है।

विश्वभर के कलाकारों और मर्मज्ञों को एक साथ लाकर पिंकफेस्ट सांस्कृतिक संवेदनशीलता को विकसित करता है और सौन्दर्यबोध से हम सब को जोड़ता है। यह हमारे भीतर विद्यमान कल्पना के रंगों को और चटक करता है, हमारी परंपराओं की जड़ों को पुनर्जीवित करता है और हमें यह स्मरण कराता है कि कला और संस्कृति ही वे सूक्ष्म, किंतु सुदृढ़ धागे हैं, जो सम्पूर्ण मानवता को एक सूत्र में बाँधते हैं।

इसलिए आइये हम सहभागी बनें ‘पिंकफेस्ट 2026’ के। 

https://www.pinkfest.in/






































































































 

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